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सोमवार, अप्रैल 29, 2013
सोमवार, मई 28, 2012
गंगा की धार
विस्तार है अपार,
प्रजा दोनो पार, करे हाहाकार,
निशब्द सदा, ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?
नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई,
निर्लज्ज भाव से, बहती हो क्यूँ ?
इतिहास की पुकार,
करे हुंकार, ओ गंगा की धार,
निर्बल जन को, सबल संग्रामी,
समग्रगामी, बनाती नहीं हो क्यूँ ?
अनपढ जन, अक्षरहीन, अनगिन जन,
भाग्य विहीन नेत्र विहिन देख मौन मौन हो क्यूँ ?
व्यक्ति रहे, व्यक्ति केन्द्रित, सकल समाज,
व्यक्तित्व रहित, निष्प्राण समाज
को तोड़ती न क्यूँ ?
तेजस्विनी, क्यों न रही तुम निश्चय
इतना नहीं प्राणों में प्रेरणा देतीं न क्यूँ
उन्मद अवनी, कुरुक्षेत्र बनी, गंगे जननी
नवभारत में भीष्म रूपी सुत समरजयी जनती
नहीं हो क्यूँ ?
बुधवार, मई 23, 2012
हॅपी-सॅड
Eeh..Silent movie, thoda sound de na!
Tu sad sad kyon hai, happy-sad kyon nahi?
Hum sad kyun hote hain? Kyonki mann bhaari hai, heavy heavy!
Mann kab heavy, heavy hota hai? Jab mann ko koi hurt karta hai!
Mann ko kon itna hurt kar sakta hai? Jo mann ke very very close hota hai!
Mann ke very very close kon hota hai? Jiske sang mann very very happy feel karta hai!
Happy tha, isliye sad hai na, So be happy-sad not sad-sad!”
ऐ..साइलेंट मूवी, थोड़ा साउंड दे ना!
तू सॅड सॅड क्यों है, हॅपी-सॅड क्यों नही?
हम सॅड क्यूँ होते हैं? क्योंकि मंन भारी है, हेवी हेवी!
मंन कब हेवी, हेवी होता है? जब मंन को कोई हर्ट करता है!
मॅन को कोन इतना हर्ट कर सकता है? जो मॅन के वेरी वेरी क्लोज़ होता है!
मॅन के वेरी वेरी क्लोज़ कोन होता है? जिसके संग मॅन वेरी वेरी हॅपी फील करता है!
हॅपी था, इसलिए सॅड है ना, सो बे हॅपी-सॅड नोट सॅड-सॅड!”
बुधवार, मार्च 21, 2012
तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
ज़िहाले-मस्ती मक़ाम बे रंजिश
बेहाल हिजरा बेचारा दिल है
ज़िहाले-मस्ती मक़ाम बे रंजिश
बेहाल हिजरा बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन... तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन... तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
वो आपके पहलू में ऐसे बैंठे
वो आपके पहलू में ऐसे बैंठे
की शामें रंगीन हो गयी है
की शामें रंगीन हो गयी है
की शामें रंगीन हो गयी है
ज़रा ज़रा सी खिली तबीयत ज़रा सी गमगीन हो गयी है
ज़रा ज़रा सी खिली तबीयत ज़रा सी गमगीन हो गयी है
ज़िहाले-मस्ती मक़ाम बे रंजिश
बेहाल हिजरा बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन... तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
कभी-कभी शाम ऐसे ढलती है
जैसे घूँघट उतर रहा है.उतर रहा
कभी-कभी शाम ऐसे ढलती है
जैसे घूँघट उतर रहा है.उतर रहा
तुम्हारे सीने से उठता धुआँ
हमारे सीने से गुज़र रहा है
तुम्हारे सीने से उठता धुआँ
हमारे सीने से गुज़र रहा है
ज़िहाले-मस्ती मक़ाम बे रंजिश
बेहाल हिजरा बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन... तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
यह शरम है या हया है,क्या है
नज़र उठाते ही झुक गयी है
नज़र उठाते ही झुक गयी है
तुम्हारी पलकों से गिर के शबमम
हमारी आँखों में रुक गयी है
तुम्हारी पलकों से गिर के शबमम
हमारी आँखों में रुक गयी है
ज़िहाले-मस्ती मक़ाम बे रंजिश
बेहाल हिजरा बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन... तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन... तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
बेहाल हिजरा बेचारा दिल है
ज़िहाले-मस्ती मक़ाम बे रंजिश
बेहाल हिजरा बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन... तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन... तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
वो आपके पहलू में ऐसे बैंठे
वो आपके पहलू में ऐसे बैंठे
की शामें रंगीन हो गयी है
की शामें रंगीन हो गयी है
की शामें रंगीन हो गयी है
ज़रा ज़रा सी खिली तबीयत ज़रा सी गमगीन हो गयी है
ज़रा ज़रा सी खिली तबीयत ज़रा सी गमगीन हो गयी है
ज़िहाले-मस्ती मक़ाम बे रंजिश
बेहाल हिजरा बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन... तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
कभी-कभी शाम ऐसे ढलती है
जैसे घूँघट उतर रहा है.उतर रहा
कभी-कभी शाम ऐसे ढलती है
जैसे घूँघट उतर रहा है.उतर रहा
तुम्हारे सीने से उठता धुआँ
हमारे सीने से गुज़र रहा है
तुम्हारे सीने से उठता धुआँ
हमारे सीने से गुज़र रहा है
ज़िहाले-मस्ती मक़ाम बे रंजिश
बेहाल हिजरा बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन... तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
यह शरम है या हया है,क्या है
नज़र उठाते ही झुक गयी है
नज़र उठाते ही झुक गयी है
तुम्हारी पलकों से गिर के शबमम
हमारी आँखों में रुक गयी है
तुम्हारी पलकों से गिर के शबमम
हमारी आँखों में रुक गयी है
ज़िहाले-मस्ती मक़ाम बे रंजिश
बेहाल हिजरा बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन... तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन... तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
शुक्रवार, फ़रवरी 03, 2012
Kajrare Kajrare (khol lined eyes)
A beautiful piece of poetry
specially reference to kali kamli or ballimaran
running metaphor of angdayi is also too great
http://gulzar101.blogspot.in/2012/02/kajraare-bunty-aur-babli.html#comment-form
and from my college
http://www.youtube.com/watch?v=ZVtpV3PHIHg
specially reference to kali kamli or ballimaran
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रविवार, सितंबर 26, 2010
उड़ान
छोटी छोटी छितराई यादें
बिछी हुईं हैं लम्हों की लौं में
नंगे पैर उनपर चलते चलते
इतने दूर आ गए है हम की अब
भूल गए हैं जूतें कहाँ उतारें थे
एड़ी कोमल थी जब आये थे
थोड़ी सी नाजुक है अभी भी और
नाजुक ही रहेगी
इन खट्टी मीठी यादों की शरारत
जब तक इन्हें गुदगुदाती रहे
सच
भूल गए हैं जूतें कहाँ उतारें थे
पर लगता है अब उनकी जरूरत नहीं
बिछी हुईं हैं लम्हों की लौं में
नंगे पैर उनपर चलते चलते
इतने दूर आ गए है हम की अब
भूल गए हैं जूतें कहाँ उतारें थे
एड़ी कोमल थी जब आये थे
थोड़ी सी नाजुक है अभी भी और
नाजुक ही रहेगी
इन खट्टी मीठी यादों की शरारत
जब तक इन्हें गुदगुदाती रहे
सच
भूल गए हैं जूतें कहाँ उतारें थे
पर लगता है अब उनकी जरूरत नहीं
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